इस्लाम-धर्म में पवित्र व परिष्कार के उपर विशेष गुरुत्व दिया है.


और इस चीज़ के लिए तीन पथ क़बूल करने के लिए निर्देश प्रदान क्या है।

1- शराब पिना, ज़िना, लवात, संगीत और वेह चीज़ जिस से समस्त प्रकार व्याधी बिस्तार होती है, उस से विरत रहने के लिए बड़ा सख़्त निर्देश प्रदान किया है। उपर जो चीज़ बयान हुआ है वेह समस्त प्रकार चीजे़ जो समाज और मुआशिरा की आज़ाद को ख़राब कर देती है और वह यह है। जो चीजें मुआशिरा में एक तरह के फँसाद और शरिरीक़ व्याधियों में मुबतिला कराते है. और यही कारण है कि इस्लाम इन तमाम फ़साँद व चीजों से विरत रहने के लिए हराम घोषणा क़रार दिया है। इस के अनुरुप साफ़-सुतरा परिष्कार ज़िन्देगी बसर करने के लिए कुछ संविधान व क़वानीन जो इंनसानों के सहैत की मुताबिक़ है जारी किया है, जैसा कि साफ़, सुतरा रहना- परिष्कार रहने के लिए सख़्त निर्देश जारी किया है. अपने शरीर को प्रत्येक दिन गोस्ल दिलाना, शरीर के खराब रक्त को निकाल देना, (हिजामत करना) तेल मालिश करना, आख़ों में सूर्मा लगाना, प्रत्येक दिन सही तरीके से अपने दातों को मिसवाक कराना, ज़रुरत के बहार यानी ज़यादा बालों को काटना, सही समय पर विबाह करना, उपवास रख़ना, और ख़ाना ख़ाते के समय सेहैत की तमाम संविधान व आईन का स्मरण करना अथवा....।
2- कोई भी व्याधि पुराना होने से पहले उस व्याधि को दुर करने के लिए कुछ निर्देश दिया है. व्याधि चिकितसा करने का उत्तम व बह्तर क़ानुन तिब्बुन्नवी (सा) तिब्बूल आईम्माह (अ) व तिब्बूस सादिक़ (अ) व तिब्बूर रिज़ा (अ) की पूस्तकों में चिकित्सा कि उत्तम पद्धति बताया गया है। इस के व्यतीत अपनी सेहत के अग्रसर के लिए विशेष गुरुत्व भी दिया है।
3- एक डॉक्टर व चिकीत्सक को पुरी तरह अपने दायित्व व कर्तव्य निभाने के लिए सख़्त निर्देश दिया है, और अच्छी से अच्छी चिकतसा पर ज़ोर दिया है। इस्लामी आईन व संविधान के मुताबिक़ अगर कोई डॉक्टर किसी एक व्याधि को भूल से दवा लिख़ दिया तो यह दायित्व उस डॉक्टर के उपर आरोप होता है और इस्लाम के आईन मुताबिक़ मरीज़ की तमाम ज़िम्मेदरियाँ उस डॉक्टर पर होती है।
यह व्यतीत और भी कहा गया है कि मरीज़ के मर्ज़ को छोटा करके देख़ा जाएं ताकि एक मरीज़ के लिए संभव हो सके कि अपने को इस व्याधि से परित्राण दिला सके, और अपने मर्ज़ को नष्ट कर सके। एक डॉक्टर को चाहिए कि मिठी मिठी ज़बान के द्बारा एक मरीज़ के साथ कथा बोले और उस के साथ अच्छे बर्ताऔ करे, और गंभीर चिन्ता व चेताउना के साथ अपना काम व दायित्व को अंजाम दे और यह काम एक डॉक्टर के महत्वपूर्ण कामों में से है।
लिहज़ा इस्लाम ने अपनी पैरुवी करने वालों व शरीर-सहैत को ठिक रख़ने के लिए एक क़ानून-संविधान बनाया है। इस क़ानून का पैरुवी करना फ़रज़ है हमारे पहले व्याक्तियों ने इस क़ानुन को क़बूल किया और बहूत फैदा हासिल किया है।
बड़े दुख़ के साथ कहना पढ़ता है कि आज के यूग के डॉक्टर व ज्ञानी व्यक्ति मर्ज़ को दुर करने से विचलित है । और हमारे चारों तरफ़ व्याधि व मरीज़ों की भरमार है। लिहज़ा इस यूग में साईन्स डॉक्टरी के साथ साथ अगर अपनी सहैत व शरीर को बचाने के लिए इसलामी डॉक्टरि शूरु करें तो शरीर में कठिन से कठिन व्याधि प्रवेश न करती और जल्दि उस की सहैत भी ख़राब न होति. सही व सठिक शरीर को लेके सही तरीके से जीवन बसर करना हमारा एक दायित्व है।

परिवर संगठन

पवित्र इस्लाम धर्म में विवाह के लिए ताकीद की है, जो एक व्यक्ति व एक पूरुष के गुणावली चाहिदा को पूर्ण करता है, और इस्लाम ने इस चीज़ के लिए बड़ा गुरुत्व व ताकीद की है, हदीस में वर्णन हूआ है की इस्लाम में विवाह एक ऐसी चीज़ है जिस से बड़ कर और कोई चीज़ नहीं हो सकति और ना इंसान इस से बड़ी आशा प्रकाश कर सकता है। और इस्लाम में एक परिवर बनाने के लिए इस से उत्तम और कोई चीज़ बयान नहीं की है, इस्लाम में इस विवाह को आधा दिन बताया गया है हदीस में बयान हुआ है विवाहित व्यक्ति अपने अधे धर्म का संरक्षण किया है।
मानव जीवन में जब यौन का एक ढेव ख़ेलता है तो इस्लाम ने उस समय को विवाह करने का एक उत्तम समय बताया है। और इस्लाम में एक पूत्र के लिए 15 साल और एक पूत्री के लिए 9 साल बयान किया गया है। इस्लाम की दृष्ट में वेह दोनों के लिए विवाह होने का एक उत्तम समय निर्धारण किया गया है, और इस समय वेह दोनों विवाहित बन्धन से जुढ़ बन सकते है। हलाकि इस्लाम में पूत्र व पूत्री के लिए एक मुनासिबत को बयान नहीं किया है और ना उस विषय को निर्वाचन किया है. बल्कि मुस्लमान नारी व पूरुष के मर्ज़ि की मुताबिक़ अपने विवाह के ज़रीए तमाम रिश्तेदारी व अपना चाहिदा के पूर्ण कर सकता है नतिजे में समाज और मुआशिरा को एक ख़राब मुआशिरा से बचा सकता है ।
इस्लाम में नारी व पूरुष को हराम तरीके से मिला-मिशा रिश्तेदार को हराम क़रार दिया है और नारीयों के लिए पर्दा व हिजाब परिधान के लिए ताकीद क़रार दी है। नतीजे में समाज में ख़राब चरित्र का परिमाण कम होगा, और परिवार बधंन की एक मजबूत ख़ुंटि बनेगी । बीबी व शोहर के लिए महब्बत के साथ ज़िन्देगी करने का समय फराहम हो जाये गा और ईमान व ईमान्दारी के साथ अपना आख़लाक़ी ज़िम्मेदरी को निभाना व सम्पादन में एक मोह्काम सहायता मिले गा।
बीबी अपने गृह के तमाम काम और शोहर कि चाहतों को पूर्ण करेगी और शोहर बहार के समस्त प्रकार काम विशेष करके अर्थ व्यावस्था को सठीक करेंगें।
अगर सब ऐसी ज़िन्देगी करने पर तैयार हो तो भविष्यत नसल की ऊज्जवल होने में एक बह्तरीन कारण बनेगा ।
इस्लाम में नारीयों को भारी व कठिन काज से दुर रहने का निर्देश दिया है, और गृह में तमाम कामों को अंजाम देने का निर्देश जारी किया है लेकिन इस काम से दुर रहने का निषेध नहीं क्या. अल बत्ते यह बात परिष्कार है की इस्लाम में नारीयों के लिए बाहर का काम करने का निषेध नहीं किया. लेकिन वेह काम जो नारीयों के लिए मूनासिब और सूंदर है। और उसके इलावा तमाम कामों को हराम घोषित क्या है। लेकिन इस्लाम में नारीयों के लिए ज्ञान अर्जन करना जाएज़ अथवा मजबूर क्या है।
यहाँ कहना ज़रुरी है, कि पश्चिम देशों के समस्त ज्ञानी इस चीज़ को क़बूल करते पर असहाय है, कि सही व सालिम जीवन बसर करना समस्त शरिरीक चाहतों को पूर्ण करता है, और मानव जीवन में शान्ति विस्तार के लिए सहायता मिलता है।
सही व सालिम संतान अर्जन करना और अपनी तक़दीर को अच्छा बनाने के लिए इस्लाम ने जो बह्तरीन क़ानून बनाया है यह है कि इस्लाम को अपना धर्म क़रार दे और विवाह करके एक परिवर और बीबी व शोहर के तमाम दायित्व को अंजाम दें सही व सालिम ज़न्देगि बसर करना वगैरह...., यह सब मानव जीवन से सम्पर्क है।
अगर इंसान इस्लामी आईन व निर्देश के मुताबिक़ ज़न्देगी बसर करे और उस क़ानुन पर अमल करे, तो यक़ीनन इंसान का नसीब और तक़दीर परिवर्तन हो जाएगा और सारी मसीबतें और दुख़ व पिड़ाओ से मुक्त हो जाएगा।
दुसरी बातः समाज में अच्छे सदाचर के साथ पेश आना, तथाः माता-पिता संतान, रिश्तेदार, गुरु, शार्गिदों के साथ इस्लामी सदाचरण से पेश आना वगैरह.... और समाज में इस्तरह ज़न्देगी बसर करने से व्याक्तियों के दर्मियान अमन, मुहब्बत, शान्ति पैदा करती है।